जिन छात्रों ने हसीना को सत्ता से हटाया,उनको वोटरों ने चुनाव हरा दिया, बांग्लादेश में चौंकाने वाले नतीजे
x
हसीना विरोधी आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल नाहिद इस्लाम का चुनाव में जमात से हाथ मिलाना भारी पड़ गया

जिन छात्रों ने हसीना को सत्ता से हटाया,उनको वोटरों ने चुनाव हरा दिया, बांग्लादेश में चौंकाने वाले नतीजे

बांग्लादेश के चुनाव में जमात और उसके गठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा है। इस गठबंधन के झंडे़ तले ही शेख हसीना को हटाने में अहम भूमिका निभाने वाले नाहिद इस्लाम की पार्टी भी लड़ रही थी, वह भी केवल 5 सीट जीत पाई है।


Click the Play button to hear this message in audio format

बांग्लादेश के संसदीय चुनाव में इस बार सबकी नजरें उन छात्र नेताओं पर थीं, जिन्होंने अगस्त 2024 में शेख हसीना की मजबूत सरकार के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया था। लेकिन अब तक आए चुनावी नतीजे दिखाते हैं कि आंदोलन की लोकप्रियता वोट में तब्दील नहीं हो सकी।

शेख हसीना को सत्ता से हटाने के बाद जो छात्र नेता नई राजनीतिक ताकत के रूप में उभरे थे, वे जनता का भरोसा जीतने में नाकाम रहे। जमात के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने वाली नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) का प्रदर्शन उम्मीदों से काफी कमजोर रहा।

स्थानीय मीडिया के मुताबिक, एनसीपी ने 30 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन केवल 5 सीटों पर जीत दर्ज कर सकी। अन्य प्रमुख दलों की तुलना में यह नतीजा बेहद निराशाजनक माना जा रहा है।

संगठनात्मक कमजोरी बनी बड़ी वजह

विशेषज्ञों का मानना है कि हसीना विरोधी आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल नाहिद इस्लाम और अन्य छात्र नेता एक मजबूत और एकजुट संगठन खड़ा नहीं कर पाए। आंदोलन के बाद वे अलग-अलग राजनीतिक धड़ों में बंट गए, जिससे पार्टी की पकड़ कमजोर होती गई।

चुनावी मैदान में उनकी संगठनात्मक क्षमता बीएनपी के मुकाबले काफी कमजोर साबित हुई। जैसे-जैसे चुनाव प्रचार आगे बढ़ा, युवाओं का झुकाव स्थिरता और सशक्त शासन की उम्मीद में बीएनपी की ओर बढ़ता गया। इससे एनसीपी का संभावित युवा वोट बैंक भी प्रभावित हुआ।

वोटरों का रुझान बदला

रिपोर्ट्स के अनुसार, आवामी लीग के कुछ पारंपरिक वोटरों ने भी बीएनपी की ओर रुख किया। कई मतदाता शेख हसीना सरकार के पतन के लिए छात्र नेताओं को जिम्मेदार मान रहे थे, जिससे नए राजनीतिक चेहरों पर भरोसा कम दिखा।

जमात से गठबंधन का असर

एनसीपी ने जमात के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने का फैसला किया, जिसे राजनीतिक विश्लेषक एक रणनीतिक जोखिम मान रहे हैं। जमात की छवि पाकिस्तान समर्थक दल के रूप में देखी जाती रही है और उसके ऐतिहासिक विवाद भी रहे हैं।

गठबंधन के फैसले से एनसीपी के भीतर भी मतभेद उभरे और एक धड़ा अलग हो गया, जिससे पार्टी और कमजोर हो गई।

कुल मिलाकर, छात्र आंदोलन से निकली राजनीतिक ताकत इस चुनाव में अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ सकी और बांग्लादेश की राजनीति में स्थिर और संगठित दलों का वर्चस्व बरकरार रहा।

Read More
Next Story