अमेरिका को नहीं रहा इजराइल पर भरोसा! जासूसी का शक
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अमेरिका को नहीं रहा इजराइल पर भरोसा! जासूसी का शक

ईरान वार्ता के बीच ट्रंप के टॉप नेगोशिएटर स्टीव विटकॉफ समेत कई बड़े अधिकारी रडार पर। अमेरिका ने खतरे का स्तर 'क्रिटिकल' किया; इजरायल और व्हाइट हाउस ने नकारा।


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US Israel Relations: अमेरिका और उसके सबसे भरोसेमंद क्षेत्रीय सहयोगी इजरायल के बीच पर्दे के पीछे एक बड़ा खुफिया कूटनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के हालिया आकलनों में यह गंभीर चिंता जताई गई है कि इजरायल, ईरान के साथ चल रही बेहद संवेदनशील बातचीत में शामिल अमेरिकी अधिकारियों की जासूसी करने और जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहा है। 'द न्यू यॉर्क टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, इस कथित जासूसी के केंद्र में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टॉप नेगोशिएटर स्टीव विटकॉफ, पेंटागन के टॉप पॉलिसी ऑफिशियल एलब्रिज ए. कोल्बी और उनके मुख्य डिप्टी माइकल पी. डिमिनो चतुर्थ जैसे बेहद हाई-प्रोफाइल नाम शामिल हैं।


हालांकि अमेरिका और इजरायल दोनों ही यह अच्छी तरह जानते हैं कि वे एक-दूसरे पर खुफिया नजर रखते हैं, लेकिन अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि इजरायल की हालिया गतिविधियों ने तय और स्वीकार्य सीमाओं को पार कर दिया है। यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब एक तरफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तेहरान (ईरान) के साथ बातचीत के जरिए समझौता करने की कोशिशों में जुटे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ईरान की क्षमताओं को पूरी तरह खत्म करने और उसकी सरकार को कमजोर करने के लिए सख्त सैन्य रणनीति पर जोर दे रहे हैं।

पेंटागन ने थ्रेट लेवल को 'हाई' से 'क्रिटिकल' किया; फोन में मिले संदिग्ध सॉफ्टवेयर
इजरायल की इस कथित खुफिया सक्रियता के बाद अमेरिकी रक्षा विभाग के भीतर हड़कंप मच गया है और सुरक्षा संबंधी कड़े कदम उठाए जा रहे हैं:

खतरे का स्तर बढ़ा: डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) द्वारा अन्य सैन्य व सुरक्षा एजेंसियों के सहयोग से तैयार की गई एक रिपोर्ट के बाद इजरायल से जुड़े काउंटर-इंटेलिजेंस जोखिम के खतरे के स्तर को 'हाई' से बढ़ाकर सीधे 'क्रिटिकल' (गंभीर) कर दिया गया है।

सॉफ्टवेयर से हुआ खुलासा: यह कड़ा फैसला तब लिया गया जब इजरायल में तैनात अमेरिकी रक्षा कर्मियों के फोन में एक ऐसा संदिग्ध सॉफ्टवेयर इंस्टॉल पाया गया, जो उनके कम्युनिकेशंस और बातचीत की निगरानी करने में सक्षम था।

डेटा शेयरिंग पर लग सकती है रोक: अधिकारियों के अनुसार, इजरायल की मुख्य दिलचस्पी केवल युद्धक्षेत्र की खुफिया जानकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि वह यह भांपना चाहता है कि ईरान को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप का अगला रुख क्या होगा। यदि यह अविश्वास जारी रहता है, तो पेंटागन भविष्य में इजरायल के साथ साझा की जाने वाली खुफिया जानकारियों पर कई तरह के प्रतिबंध लगा सकता है।

व्हाइट हाउस और इजरायल ने दावों को पूरी तरह नकारा; बताया 'झूठा और राजनीति से प्रेरित'
इस सनसनीखेज रिपोर्ट के सामने आने के बाद दोनों ही पक्षों की तरफ से इन आरोपों को सिरे से खारिज और डिफ्यूज करने की कोशिशें शुरू हो गई हैं:

व्हाइट हाउस का बयान: एनबीसी न्यूज से बातचीत में व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। अधिकारी ने कहा, "यह पूरी कहानी पूरी तरह से झूठी और गलत है। इसे किसी ऐसे व्यक्ति के हवाले से प्लांट किया गया है जिसे वर्तमान में चल रहे घटनाक्रम की कोई जमीनी जानकारी ही नहीं है।"

इजरायली दूतावास की सफाई: वाशिंगटन में इजरायली दूतावास के प्रवक्ता ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि इजरायल अमेरिकी सरकारी अधिकारियों या संस्थानों की जासूसी नहीं करता है। उन्होंने साफ किया, "इजरायल की खुफिया कोशिशें उसके दुश्मनों के खिलाफ हैं, सहयोगियों के खिलाफ नहीं। इसके उलट किया जा रहा कोई भी दावा या तो पूरी तरह से गलत जानकारी पर आधारित है या फिर राजनीति से प्रेरित है।"

भले ही दोनों देश सार्वजनिक रूप से इस विवाद को दबाने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन सेंट्रल कमांड के जरिए चल रहे उनके अभूतपूर्व सैन्य सहयोग के बीच इस खुफिया रार ने वाशिंगटन के गलियारों में हलचल जरूर पैदा कर दी है।


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