
होर्मुज से लेबनान तक गहराया संकट, अमेरिका-ईरान-इजरायल में शांति अभी दूर
अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष अब परमाणु मुद्दे से आगे बढ़कर होर्मुज और लेबनान तक पहुंच गया है, जिससे शांति वार्ता और जटिल हो गई है।
अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच जारी संघर्ष अब केवल ईरान के परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं रह गया है। यह विवाद अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, लेबनान में इजरायली सैन्य अभियान और पश्चिम एशिया की व्यापक भू-राजनीतिक चुनौतियों से जुड़ चुका है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ और द फेडरल के कंसल्टिंग एडिटर के.एस. दक्षिणा मूर्ति का मानना है कि सभी पक्ष शांति की बात तो कर रहे हैं, लेकिन उनके लक्ष्य अलग-अलग हैं, जिसके कारण किसी भी समझौते तक पहुंचना बेहद कठिन हो गया है।
ईरान, अमेरिका और इजरायल के अलग-अलग लक्ष्य
दक्षिणा मूर्ति के अनुसार, ईरान की प्राथमिकता साफ है। वह अपनी संप्रभुता से समझौता किए बिना शांति समझौता चाहता है। ईरान किसी दबाव में आकर कोई समझौता नहीं करना चाहता।वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख यह है कि ईरान के पास परमाणु कार्यक्रम ही नहीं होना चाहिए। अमेरिका चाहता है कि समृद्ध यूरेनियम (Enriched Uranium) ईरान के पास न रहे और उसे किसी तीसरे पक्ष या अमेरिका को सौंप दिया जाए, ताकि ईरान परमाणु हथियार विकसित न कर सके।
दूसरी ओर, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिव नेतन्याहू का उद्देश्य ईरान में शासन परिवर्तन (Regime Change) है। नेतन्याहू चाहते हैं कि ईरान की मौजूदा इस्लामी व्यवस्था की जगह ऐसा राजनीतिक ढांचा आए जो इजरायल के प्रति कम शत्रुतापूर्ण हो।यही तीन अलग-अलग मांगें किसी भी संभावित समझौते को जटिल बनाती हैं।
बदला अमेरिका का फोकस
शुरुआत में ट्रंप ईरान से परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म करने की मांग कर रहे थे। लेकिन समय के साथ उनका रुख कुछ नरम होता दिखाई दे रहा है।हाल ही में संघर्षविराम को 60 दिनों के लिए बढ़ाए जाने के बाद अमेरिका का मुख्य ध्यान अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर केंद्रित हो गया है। अमेरिका चाहता है कि यह महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग खुला रहे और ईरान इस पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश न करे।
इसके बदले अमेरिका फारस की खाड़ी में लगाए गए कुछ प्रतिबंधों और नाकेबंदी उपायों में ढील देने को तैयार दिख रहा है। बाद में परमाणु मुद्दे पर अलग से बातचीत की जा सकती है।हालांकि, इजरायल इस दिशा से संतुष्ट नहीं है क्योंकि उसे इस व्यवस्था में अपने हित कम नजर आते हैं।
ट्रंप पर बढ़ रहा घरेलू दबाव
दक्षिणा मूर्ति के अनुसार, ट्रंप इस युद्ध को समाप्त करना चाहते हैं क्योंकि अमेरिका के भीतर उन पर राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है।उनकी लोकप्रियता में गिरावट देखी जा रही है और आशंका है कि यह संघर्ष आगामी मध्यावधि चुनावों (Mid-Term Elections) में रिपब्लिकन पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है।रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी कुछ नेता इस मुद्दे पर ट्रंप के खिलाफ जाकर डेमोक्रेट्स का समर्थन कर रहे हैं। ऐसे में ट्रंप के लिए यह स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो गई है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना नया केंद्र
हाल के दिनों में तनाव लगातार बना हुआ है। ईरान पर कुवैत को निशाना बनाने के आरोप लगे हैं, जबकि ईरान का कहना है कि उसकी गतिविधियां स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और फारस की खाड़ी की स्थिति से जुड़ी हैं।अमेरिका का आरोप है कि ईरान ड्रोन के जरिए समुद्री यातायात को खतरा पहुंचा रहा है।फिलहाल दोनों पक्षों की प्राथमिकता होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बने तनाव को कम करना दिखाई देती है। बड़े मुद्दों को फिलहाल पीछे रख दिया गया है।
लेबनान क्यों बना सबसे बड़ा विवाद?
लेबनान की भूमिका को समझने के लिए पहले हिजबुल्लाह को समझना जरूरी है।Hezbollah लेबनान का एक राजनीतिक संगठन है, जिसके पास अपना सशस्त्र मिलिशिया बल भी है। इसे लेबनान के शिया समुदाय का व्यापक समर्थन प्राप्त है।
संघर्ष की शुरुआत में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या की खबरों के बाद हिजबुल्लाह ने इजरायल पर रॉकेट हमले किए। दक्षिणी लेबनान से उत्तरी इजरायल पर दागे गए इन रॉकेटों के जवाब में इजरायल ने लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू कर दिए।यहीं से लेबनान सीधे संघर्ष का हिस्सा बन गया।
ईरान हिजबुल्लाह को नहीं छोड़ सकता
हिजबुल्लाह को ईरान का सबसे करीबी क्षेत्रीय सहयोगी माना जाता है। ईरान उसे आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक समर्थन देता रहा है।इसी कारण ईरान शांति वार्ता के दौरान हिजबुल्लाह को नजरअंदाज नहीं कर सकता। ईरान की मांग है कि इजरायल हिजबुल्लाह पर हमले बंद करे। साथ ही हिजबुल्लाह को भी इजरायल पर हमले रोकने होंगे।इसके अलावा, लेबनान में लितानी नदी के दक्षिण में इजरायल द्वारा कब्जा किए गए क्षेत्रों का मुद्दा भी अलग वार्ता का विषय बना हुआ है।
नेतन्याहू पर भी है दबाव
इजरायल के भीतर भी नेतन्याहू को कई तरह के दबावों का सामना करना पड़ रहा है।एक तरफ ट्रंप युद्ध समाप्त करने का दबाव बना रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी दक्षिणपंथी गठबंधन सरकार के सहयोगी हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई जारी रखने और लेबनान के कब्जे वाले इलाकों से पीछे न हटने की मांग कर रहे हैं।इसी बीच ईरान ने भी कुछ समय के लिए अमेरिका के साथ वार्ता रोक दी थी क्योंकि वह लेबनान में जारी इजरायली हमलों से नाराज था।इस वजह से लेबनान अब शांति प्रक्रिया की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बन गया है।
दुनिया की नजर किस पर होनी चाहिए?
दक्षिणा मूर्ति का मानना है कि इस पूरे संकट में सबसे महत्वपूर्ण पहलू मध्यस्थता (Mediation) की प्रक्रिया है।पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र, सऊदी अरब और अब कतर जैसे देश दोनों पक्षों के बीच बातचीत कराने की कोशिश कर रहे हैं।अमेरिकी कांग्रेस में भी ट्रंप के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं। कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने डेमोक्रेट सांसदों के साथ मिलकर ऐसे प्रस्तावों का समर्थन किया है जिनका उद्देश्य ईरान के खिलाफ युद्ध को सीमित करना है।
खाड़ी देशों पर भी इस युद्ध का गंभीर आर्थिक असर पड़ा है। उनकी स्थिरता और वैश्विक प्रतिष्ठा प्रभावित हुई है। इसलिए वे भी अमेरिका और ईरान दोनों पर तनाव कम करने का दबाव बना रहे हैं।विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि शांति की कोई संभावना है तो वह केवल बातचीत और मध्यस्थता के जरिए ही सामने आएगी।
भारत की संतुलित रणनीति
भारत की स्थिति इस पूरे संघर्ष में काफी सावधानीपूर्ण रही है।भारत के अमेरिका, ईरान और इजरायल—तीनों देशों के साथ अच्छे संबंध हैं। अमेरिका के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी है, ईरान के साथ पुराने संबंध हैं और इजरायल के साथ भी पिछले वर्षों में रिश्ते मजबूत हुए हैं।इसी वजह से भारत किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने से बचता रहा है।संयुक्त राष्ट्र महासभा और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत लगातार शांति, संवाद और कूटनीतिक समाधान की वकालत करता रहा है। दक्षिणा मूर्ति का मानना है कि भारत अपने संतुलित संबंधों के कारण एक विश्वसनीय मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता था, लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार फिलहाल ऐसी भूमिका निभाने में विशेष रुचि नहीं दिखा रही है।
अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष अब केवल परमाणु कार्यक्रम का मुद्दा नहीं रह गया है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, हिजबुल्लाह, लेबनान और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन जैसे कई नए आयाम इसमें जुड़ चुके हैं।जहां अमेरिका युद्ध समाप्त करने की कोशिश में दिखाई दे रहा है, वहीं इजरायल और ईरान अपने-अपने रणनीतिक हितों से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में शांति की राह अभी भी कठिन है, लेकिन मध्यस्थता और कूटनीतिक प्रयास ही इस संकट से निकलने का सबसे बड़ा रास्ता माने जा रहे हैं।

