
H-1B वीजा पर ट्रंप का बड़ा प्रहार, सैलरी में भारी इजाफे से मची खलबली
अमेरिकी कंपनियों पर बढ़ेगा 43 अरब डॉलर का वित्तीय बोझ। भारतीय आईटी सेक्टर और कुशल पेशेवरों के लिए अमेरिका में नौकरी पाना अब होगा और भी महंगा और चुनौतीपूर्ण।
Trump Administration On H-1B Visa : डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने विदेशी पेशेवरों के लिए अमेरिका के दरवाजे छोटे करने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है। एच-1बी (H-1B) वीजा कार्यक्रम के तहत काम करने वाले विदेशी कर्मचारियों की न्यूनतम सैलरी (बेस सैलरी) में भारी बढ़ोतरी का प्रस्ताव पेश किया गया है। इस फैसले ने न केवल सिलिकॉन वैली की दिग्गज टेक कंपनियों, बल्कि भारत जैसे देशों के लाखों आईटी पेशेवरों की नींद उड़ा दी है।
प्रस्तावित नियमों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अमेरिकी कंपनियां विदेशी श्रमिकों का उपयोग 'सस्ते श्रम' के रूप में न कर सकें। यह प्रस्ताव फिलहाल अमेरिकी श्रम विभाग के पास अंतिम मंजूरी के लिए है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह लागू होता है, तो अमेरिका में वैश्विक प्रतिभाओं की भर्ती का पूरा ढांचा ही बदल जाएगा।
शहरों के हिसाब से बढ़ेगी सैलरी की सीमा
प्रस्ताव के तहत अब कंपनियों को स्थान और जॉब प्रोफाइल के आधार पर भारी भरकम वेतन देना होगा। उदाहरण के लिए, दुनिया के सबसे बड़े टेक हब सिलिकॉन वैली या सैन फ्रांसिस्को में अगर कोई कंपनी किसी एंट्री-लेवल सॉफ्टवेयर इंजीनियर को एच-1बी वीजा पर बुलाती है, तो उसे कम से कम 1,62,000 डॉलर (करीब 1.35 करोड़ रुपये) सालाना वेतन देना होगा।
यही सीमा न्यूयॉर्क में करीब 1,32,000 डॉलर और डलास जैसे शहरों में 1,13,000 डॉलर तय की गई है। यह वेतन उस 'प्रचलित मजदूरी' पर आधारित है, जिसे अमेरिकी सरकार समय-समय पर अपडेट करती है। इस बदलाव से छोटी और मध्यम दर्जे की कंपनियों के लिए विदेशी प्रतिभाओं को स्पॉन्सर करना लगभग नामुमकिन हो जाएगा।
क्या है ट्रंप प्रशासन का असली मकसद?
यह पूरा मामला ट्रंप के 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' (MAGA) एजेंडे से जुड़ा है। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि मौजूदा वीजा व्यवस्था में कई खामियां हैं, जिनका फायदा उठाकर कंपनियां कम वेतन पर विदेशी कर्मचारी रख लेती हैं। इससे अमेरिकी नागरिकों के लिए उपलब्ध नौकरियों और उनके वेतन स्तर पर नकारात्मक असर पड़ता है।
प्रशासन का कहना है कि एच-1बी वीजा केवल उन्हीं लोगों को मिलना चाहिए जो 'असाधारण रूप से कुशल' हों। सरकार चाहती है कि कंपनियां पहले अमेरिकी नागरिकों को नौकरी दें और केवल तभी विदेशियों की ओर रुख करें जब वह पद बहुत ही विशिष्ट हो। आलोचकों का कहना है कि यह 'हायर अमेरिकन' नीति का ही विस्तार है।
कंपनियों पर 43 अरब डॉलर का वित्तीय भार
इमिग्रेशन डेटा फर्मों के एक गहन विश्लेषण से पता चला है कि इस नीति का वित्तीय प्रभाव चौंकाने वाला होगा। अमेरिकी नियोक्ताओं को पहले ही साल में लगभग 18 अरब डॉलर का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा। जैसे-जैसे मौजूदा एच-1बी वीजा धारक अपने रिन्यूअल (नवीनीकरण) के लिए आवेदन करेंगे, तीन साल के भीतर यह बोझ बढ़कर 43 अरब डॉलर सालाना तक पहुंच सकता है।
यह खर्च केवल वेतन तक सीमित नहीं है। एक विदेशी कर्मचारी की भर्ती और वीजा प्रक्रियाओं पर कंपनियों का कानूनी खर्च पहले ही लगभग 1,00,000 डॉलर के करीब पहुंच रहा है। ऐसे में वेतन में भारी इजाफा कंपनियों को भर्ती रोकने पर मजबूर कर सकता है।
भारतीय आईटी सेक्टर और पेशेवरों पर असर
भारत के लिए यह खबर सबसे ज्यादा चिंताजनक है क्योंकि एच-1बी वीजा का सबसे बड़ा हिस्सा भारतीय आईटी पेशेवरों के पास रहता है। टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो और एचसीएल जैसी बड़ी कंपनियों के मार्जिन पर इसका सीधा असर पड़ेगा। इसके अलावा, जो युवा पेशेवर अभी करियर की शुरुआत कर रहे हैं, उनके लिए अब अमेरिका जाने की राह बहुत कठिन हो जाएगी।
कंपनियां अब केवल उन वरिष्ठ विशेषज्ञों को ही स्पॉन्सर करेंगी जिनका अनुभव और हुनर बहुत ज्यादा हो। फ्रेशर्स और मिड-लेवल इंजीनियरों के लिए अब कंपनियां अमेरिकी स्थानीय श्रम या आउटसोर्सिंग के अन्य विकल्पों को तलाशेंगी। इससे भविष्य में भारत से होने वाले 'ब्रेन ड्रेन' की प्रकृति में भी बदलाव आ सकता है।
विदेशी प्रतिभाओं का भविष्य और चुनौतियां
हालांकि कागज पर यह प्रस्ताव विदेशी पेशेवरों के लिए अच्छा लग सकता है क्योंकि उनकी सैलरी बढ़ रही है, लेकिन हकीकत इसके उलट है। जब नियुक्ति की लागत बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी, तो कंपनियां स्पॉन्सरशिप देना ही बंद कर सकती हैं। इससे केवल उन्हीं लोगों को फायदा होगा जो पहले से वहां मौजूद हैं और बहुत अनुभवी हैं।
इसके अलावा, शिक्षा, चिकित्सा और नागरिक इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र भी इससे प्रभावित होंगे। अमेरिका के कई विश्वविद्यालय और शोध संस्थान एच-1बी वीजा के जरिए दुनिया भर के शोधकर्ताओं को बुलाते हैं। बजट की कमी के कारण ये संस्थान इस बढ़े हुए वेतन का बोझ नहीं उठा पाएंगे, जिससे अमेरिका की वैश्विक नवाचार क्षमता पर भी असर पड़ सकता है।
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